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बुधवार, 15 सितंबर 2010

पहल आपसे हो ...

कभी-कभी
यूं ही एक
मुस्कुराता सा चेहरा;
मेरी आँखों मे
तैर जाता है,
अपनी प्यारी सी
हंसी से,
मुझे सुकून
पंहुचा जाता है,
मगर जब
कभी भी
उस हंसी को,
उस एहसास को
ढूंढ पाने को,
उसमे समां जाने को,

महसूस कर पाने;
उसका अपनापन
और पा जाने को
सारा आकाश,
मै जब
बेचैन हो उठती हूँ,
देखती हूँ,
ढूंढती हूँ,
तलाश करती हूँ,
उसे अपने आस पास
मगर
हासिल होता है;
सिर्फ और सिर्फ
सिसकती आह ...

क्यों???
जवाब चाहती हूँ
मै आपसे,
क्यों गाएब है
वो प्यारी मुस्कान,
जो आपके
खुद के होने का एहसास
आपके साथ रखती है,
जुदा नहीं होने देती
आपको आपसे ही,
क्यों खो से गए है
ये एहसासात!
जो आपके अंदर है,
इसलिए उठो,
ढूंढो,
खोजो और
पहचानो
खुद मे छुपी
उस मुस्कान को,
पा जावोगे जवाब
खुद-ब-खुद
इसलिए चाहती हूँ
कि यह
पहल आपसे हो ...

9 टिप्‍पणियां:

ओशो रजनीश ने कहा…

महसूस कर पाने; उसका अपनापन और पा जाने को सारा आकाश,
मै जब बेचैन हो उठती हूँ,
देखती हूँ, ढूंढती हूँ, तलाश करती हूँ,
उसे अपने आस पास मगर हासिल होता है सिर्फ और सिर्फ सिसकती आह ...

बढ़िया लिखा है आपने ....
दर्द साफ झलकता है आपकी इन पंक्तियों में .....

इसे भी पढ़े :-
(आप क्या चाहते है - गोल्ड मेडल या ज्ञान ? )
http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_16.html

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

देखती हूँ, ढूंढती हूँ,
तलाश करती हूँ,
उसे अपने आस पास
मगर हासिल होता है
सिर्फ और सिर्फ
सिसकती आह ...
बहुत खूबसूरती से अपने एहसासों को लिखा है ....लंबी पंक्ति की जगह ऐसे टुकड़ों में लिखो तो ज्यादा प्रभावशाली लगेगा ...:):)

शुभकामनायें

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना , ...!!!

शब्दों के इस सुहाने सफ़र में आज से मैं भी आपके साथ हूँ , इस उम्मीद से की सफ़र शायद दोनों के लिए कुछ आसान हो .....मिलते रहेंगे

अथाह...




!!!

Shilpi ने कहा…

धन्यवाद् संगीता जी, आपके कहे अनुसार, मैंने पंक्तियूं मैं सुधार किया है, आपके सुझाव हमेशा से ही मेरे लिए प्रेरणास्रोत रहे हैं!

Shilpi ने कहा…

ओहो रजनीश जी आपको तो सुना ही है, शब्दों मैं पर गुना नहीं है भावों मे! आज आप स्वं ही आ गए मुझे अपना मार्गदर्शन देने!

धन्य भाग्य हमारे! जो आप जैसे महानुभावों का सानिध्य हमें मिले!

Shilpi ने कहा…

मीणा जी आपका ही हार्दिक धन्यवाद! आते रहिये उत्साह वर्धन करिये कुछ कहिये स्वाम भी समझिये हमें भी, कुछ समझाईये और

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

अपनी भावनाओं को दिशा दो, कम्जोरिओं को ही साहस और संबल बना डालो. दुनिया दयालु - कृपालु नहीं बहुत ही कठोर है, निर्दय्यी है ख़ास कर महिलाओं के लिए. ऐसी योग्यता का विस्तार करो की.......दुसरे सहारा मांगे. नेत्रित्व को विकसित करने की आवश्यकता है...................

सुरेश मिश्र ने कहा…

आदरणीय डॉ. श्री तिवारी जी,
आपने विज्ञान और तकनीक को इतने सुन्दर ढंग दे परिभाषित करते हुए निर्गुण निराकार को सगुण साकार रूप में अवतरित कर आज के अश्वत्थामा के 'ब्रह्मास्त्र' की दिशा मोड़ने का सजीव चित्रण किया है।
आपको रचना के लिए कोटिशः बधाई ....

Saurabh Pandey ने कहा…

Bahut hi Badiya kavya rachna ki hai aapne.. khoobsurat.